चूल्हा फूंकता बचपन | Life is Just a Life
 
Saturday, February 11, 2012

चूल्हा फूंकता बचपन

9 comments

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कलम विवश क्या-2 लिख जाए?
शब्द  नहीं  मिलते  भावों  को,
समय  बेचारा  बैद्य  चतुर  है,
कहीं लेप न लग जाए घावों को।

झूठी  इज्जत का बना  पुलिंदा,
कुर्सी पर  जमा हुया है पचपन,
पर असली भारत के हर घर में,
अब भी चूल्हा फूँक रहा है बचपन।

तुम किस इज्जत के रखवारे हो?
किस  धर्म  जाति के मारे हो?
तुम कहाँ  ढूंढते हो ईश्वर को?
जब वो भूखा सड़क किनारे हो।

उस  दिनकर की रचनायों सा,
वो ओज कहाँ अब लुप्त हुया?
सच को अनदेखा करने वालों,
क्या शोणित तेरा सुप्त हुया?

कैसे सो जाते हो इन रातों में?
बस  अंधे  बहरे  कंबल  ओढ़े,
मूक जवानी पर रोते भारत की,
ये काली  रात न  हमको छोड़े।

पर  हम  कैसे सो  जाएँ माँ?
बिन  अपनी  भेंट  चढ़ाये माँ?
इन  भावों  का  टूटा  गट्ठर,
शायद  तेरे  मन को भाए माँ।

9 Responses so far.

  1. RITU says:

    अच्छी कविता..

  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर की जाएगी!
    सूचनार्थ!

  3. कैसे सो जाते हो इन रातों में?
    बस अंधे बहरे कंबल ओढ़े,
    मूक जवानी पर रोते भारत की,
    ये काली रात न हमको छोड़े।

    ....बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति...

  4. bahut umda prastuti...bahut achche bhaavon ka sankalan.

  5. बहुत भावपूर्ण रचना...
    हार्दिक बधाई..

  6. पर असली भारत के हर घर में,

    अब भी चूल्हा फूँक रहा है बचपन।


    भावपूर्ण

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